श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक POST.1.31

श्रीमद्भागवतमाहात्म्य (स्कन्दपुराण) · अध्याय 1 · अथ प्रथमोऽध्यायः

सर्वेषां वांछितं कृत्वा हरिरन्तर्हितोऽभवत्।

तेनात्र त्रिविधा लोकाः स्थिताः पूर्वं न संशयः॥ ३१

sarveṣāṃ vāṃchitaṃ kṛtvā harirantarhito'bhavat|

tenātra trividhā lokāḥ sthitāḥ pūrvaṃ na saṃśayaḥ|| 31

अर्थ

अभी-अभी जो अवतार हुआ था, उसमें भगवान् अपने सभी प्रेमियोंकी अभिलाषाएँ पूर्ण करके अब अन्तर्धान हो चुके हैं। इससे यह निश्‍चय हुआ कि यहाँ पहले तीन प्रकारके भक्तजन उपस्थित थे; इसमें सन्देह नहीं है॥ ३१॥✎ 908

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #908 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् से → भगवान्‌से

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