श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक POST.1.33

श्रीमद्भागवतमाहात्म्य (स्कन्दपुराण) · अध्याय 1 · अथ प्रथमोऽध्यायः

पुनर्मौशलमार्गेण स्वाधिकारेषु चापिताः।

तल्लिप्सूंश्‍च सदा कृष्णः प्रेमानन्दैकरूपिणः॥ ३३

punarmauśalamārgeṇa svādhikāreṣu cāpitāḥ|

tallipsūṃśca sadā kṛṣṇaḥ premānandaikarūpiṇaḥ|| 33

अर्थ

फिर भगवान्‌ने ब्राह्मणके शापसे उत्पन्‍न मूसलको निमित्त बनाकर यदुकुलमें अवतीर्ण देवताओंको स्वर्गमें भेज दिया और पुनः अपने-अपने अधिकारपर स्थापित कर दिया। तथा जिन्हें एकमात्र भगवान्‌को ही पानेकी इच्छा थी, उन्हें प्रेमानन्दस्वरूप बनाकर श्रीकृष्णने सदाके लिये अपने नित्य अन्तरंग पार्षदोंमें सम्मिलित कर लिया। जो नित्य पार्षद हैं, वे यद्यपि यहाँ गुप्तरूपसे होनेवाली नित्यलीलामें सदा ही रहते हैं, परन्तु जो उनके दर्शनके अधिकारी नहीं हैं, ऐसे पुरुषोंके लिये वे भी अदृश्य हो गये हैं॥ ३३-३४॥✎ 908

यह अर्थ श्लोक 33–34 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #908 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् से → भगवान्‌से

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