॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक POST.1.15
माथुरे त्वभिषिक्तोऽपि स्थितोऽहं निर्जने वने।
क्व गता वै प्रजात्रत्या यत्र राज्यं प्ररोचते॥ १५
māthure tvabhiṣikto'pi sthito'haṃ nirjane vane|
kva gatā vai prajātratyā yatra rājyaṃ prarocate|| 15
अर्थ
यद्यपि मैं मथुरामण्डलके राज्यपर अभिषिक्त हूँ, तथापि मैं यहाँ निर्जन वनमें ही रहता हूँ। इस बातका मुझे कुछ भी पता नहीं है कि यहाँकी प्रजा कहाँ चली गयी; क्योंकि राज्यका सुख तो तभी है, जब प्रजा रहे’॥ १५॥