कृष्णप्रियं सकलकल्मषनाशनं च मुक्त्येकहेतुमिह भक्तिविलासकारि।
सन्तः कथानकमिदं पिबतादरेण लोके हि तीर्थपरिशीलनसेवया किम्॥ ९८
kṛṣṇapriyaṃ sakalakalmaṣanāśanaṃ ca muktyekahetumiha bhaktivilāsakāri|
santaḥ kathānakamidaṃ pibatādareṇa loke hi tīrthapariśīlanasevayā kim|| 98
अर्थ
संतजन! आपलोग आदरपूर्वक इस कथामृतका पान कीजिये। यह श्रीकृष्णको अत्यन्त प्रिय, सम्पूर्ण पापोंका नाश करनेवाला मुक्तिका एकमात्र कारण और भक्तिको बढ़ानेवाला है। लोकमें अन्य कल्याणकारी साधनोंका विचार करने और तीर्थोंका सेवन करनेसे क्या होगा॥ ९८॥
कृष्णप्रियं सकलकल्मषनाशनं च मुक्त्येकहेतुमिह भक्तिविलासकारि।
सन्तः कथानकमिदं पिबतादरेण लोके हि तीर्थपरिशीलनसेवया किम्॥ ९८
संतजन! आपलोग आदरपूर्वक इस कथामृतका पान कीजिये। यह श्रीकृष्णको अत्यन्त प्रिय, सम्पूर्ण पापोंका नाश करनेवाला मुक्तिका एकमात्र कारण और भक्तिको बढ़ानेवाला है। लोकमें अन्य कल्याणकारी साधनोंका विचार करने और तीर्थोंका सेवन करनेसे क्या होगा॥ ९८॥
श्रीमद्भागवत महापुराण PRE.6.98 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 79) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/mahatmya/padma/6/98/