श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक PRE.6.80

श्रीमद्भागवतमाहात्म्य (पद्मपुराण) · अध्याय 6 · अथ षष्ठोऽध्यायः

श्रीशुक उवाच

निगमकल्पतरोर्गलितं फलं शुकमुखादमृतद्रवसंयुतम् ।

पिबत भागवतं रसमालयं मुहुरहो रसिका भुवि भावुकाः॥ ८०

nigamakalpatarorgalitaṃ phalaṃ śukamukhādamṛtadravasaṃyutam |

pibata bhāgavataṃ rasamālayaṃ muhuraho rasikā bhuvi bhāvukāḥ|| 80

अर्थ

श्रीशुकदेवजी बोले—रसिक एवं भावुक जन! यह श्रीमद्भागवत वेदरूप कल्पवृक्षका परिपक्‍व फल है। श्रीशुकदेवरूप शुकके मुखका संयोग होनेसे अमृतरससे परिपूर्ण है। यह रस-ही-रस है—इसमें न छिलका है न गुठली। यह इसी लोकमें सुलभ है। जबतक शरीरमें चेतना रहे तबतक आपलोग बार-बार इसका पान करें॥ ८०॥✎ 1273

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1273 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): श्रीमद्भागवत-महापुराणकी → श्रीमद्भागवतमहापुराणकी

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