श्रीशुकदेवजी बोले—रसिक एवं भावुक जन! यह श्रीमद्भागवत वेदरूप कल्पवृक्षका परिपक्व फल है। श्रीशुकदेवरूप शुकके मुखका संयोग होनेसे अमृतरससे परिपूर्ण है। यह रस-ही-रस है—इसमें न छिलका है न गुठली। यह इसी लोकमें सुलभ है। जबतक शरीरमें चेतना रहे तबतक आपलोग बार-बार इसका पान करें॥ ८०॥✎ 1273
निगमकल्पतरोर्गलितं फलं शुकमुखादमृतद्रवसंयुतम् ।
पिबत भागवतं रसमालयं मुहुरहो रसिका भुवि भावुकाः॥ ८०
श्रीशुकदेवजी बोले—रसिक एवं भावुक जन! यह श्रीमद्भागवत वेदरूप कल्पवृक्षका परिपक्व फल है। श्रीशुकदेवरूप शुकके मुखका संयोग होनेसे अमृतरससे परिपूर्ण है। यह रस-ही-रस है—इसमें न छिलका है न गुठली। यह इसी लोकमें सुलभ है। जबतक शरीरमें चेतना रहे तबतक आपलोग बार-बार इसका पान करें॥ ८०॥
श्रीमद्भागवत महापुराण PRE.6.80 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 77) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/mahatmya/padma/6/80/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
#1273 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): श्रीमद्भागवत-महापुराणकी → श्रीमद्भागवतमहापुराणकी