श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक PRE.6.100

श्रीमद्भागवतमाहात्म्य (पद्मपुराण) · अध्याय 6 · अथ षष्ठोऽध्यायः

असारे संसारे विषयविषसङ्गाकुलधियः

क्षणार्धं क्षेमार्थं पिबत शुकगाथातुलसुधाम्।

किमर्थं व्यर्थं भो व्रजत कुपथे कुत्सितकथे

परीक्षित्साक्षी यच्छ्रवणगतमुक्त्युक्तिकथने॥ १००

asāre saṃsāre viṣayaviṣasaṅgākuladhiyaḥ

kṣaṇārdhaṃ kṣemārthaṃ pibata śukagāthātulasudhām|

kimarthaṃ vyarthaṃ bho vrajata kupathe kutsitakathe

parīkṣitsākṣī yacchravaṇagatamuktyuktikathane|| 100

अर्थ

इस असार संसारमें विषयरूप विषकी आसक्तिके कारण व्याकुल बुद्धिवाले पुरुषो! अपने कल्याणके उद्देश्यसे आधे क्षणके लिये भी इस शुककथारूप अनुपम सुधाका पान करो। प्यारे भाइयो! निन्दित कथाओंसे युक्त कुपथमें व्यर्थ ही क्यों भटक रहे हो? इस कथाके कानमें प्रवेश करते ही मुक्ति हो जाती है, इस बातके साक्षी राजा परीक्षित् हैं॥ १००॥

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