kaṇṭhe sambadhyate yena sa vaikuṇṭhaprabhurbhavet|| 101
अर्थ
श्रीशुकदेवजीने प्रेमरसके प्रवाहमें स्थित होकर इस कथाको कहा था। इसका जिसके कण्ठसे सम्बन्ध हो जाता है, वह वैकुण्ठका स्वामी बन जाता है॥ १०१॥
रसप्रवाहसंस्थेन श्रीशुकेनेरिता कथा।
कण्ठे सम्बध्यते येन स वैकुण्ठप्रभुर्भवेत्॥ १०१
श्रीशुकदेवजीने प्रेमरसके प्रवाहमें स्थित होकर इस कथाको कहा था। इसका जिसके कण्ठसे सम्बन्ध हो जाता है, वह वैकुण्ठका स्वामी बन जाता है॥ १०१॥
श्रीमद्भागवत महापुराण PRE.6.101 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 80) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/mahatmya/padma/6/101/