श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक PRE.5.38

श्रीमद्भागवतमाहात्म्य (पद्मपुराण) · अध्याय 5 · अथ पञ्चमोऽध्यायः

विद्वांसो योगनिष्ठाश्‍च ज्ञानिनो ब्रह्मवादिनः।

तन्मुक्तिं नैव तेऽपश्यन् पश्यन्तः शास्त्रसंचयान्॥ ३८ ✎ 978 979

vidvāṃso yoganiṣṭhāśca jñānino brahmavādinaḥ|

tanmuktiṃ naiva te'paśyan paśyantaḥ śāstrasaṃcayān|| 38

अर्थ

उनमें जो लोग विद्वान्, योगनिष्ठ, ज्ञानी और वेदज्ञ थे, उन्होंने भी अनेकों शास्त्रोंको उलट-पलटकर देखा; तो भी उसकी मुक्तिका कोई उपाय न मिला॥ ३८॥✎ 16

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (3)
  • #16 शब्दोंके बीचका स्थान: करो,है → करो, है
  • #978 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): तन्मुंक्त‌ि → तन्मुंक्तिं
  • #979 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): तन्मुंक्त‌िं → तन्मुक्तिं

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