श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक PRE.3.5

श्रीमद्भागवतमाहात्म्य (पद्मपुराण) · अध्याय 3 · अथ तृतीयोऽध्यायः

नानाऋषिगणैर्जुष्टं देवसिद्धनिषेवितम्।

नानातरुलताकीर्णं नवकोमलवालुकम्॥ ५

nānāṛṣigaṇairjuṣṭaṃ devasiddhaniṣevitam|

nānātarulatākīrṇaṃ navakomalavālukam|| 5

अर्थ

वहाँ अनेकों ऋषि रहते हैं तथा देवता और सिद्धलोग भी उसका सेवन करते रहते हैं। भाँति-भाँतिके वृक्ष और लताओंके कारण वह बड़ा सघन है और वहाँ बड़ी कोमल नवीन बालू बिछी हुई है॥ ५॥

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