श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक PRE.2.37

श्रीमद्भागवतमाहात्म्य (पद्मपुराण) · अध्याय 2 · अथ द्वितीयोऽध्यायः

सूत उवाच

तत्र द्वावपि संस्थाप्य निर्गतो नारदो मुनिः।

तीर्थं तीर्थं विनिष्क्रम्य पृच्छन्मार्गे मुनीश्‍वरान्॥ ३७

tatra dvāvapi saṃsthāpya nirgato nārado muniḥ|

tīrthaṃ tīrthaṃ viniṣkramya pṛcchanmārge munīśvarān|| 37

अर्थ

सूतजी कहते हैं—शौनकजी! तब ज्ञान-वैराग्य दोनोंको वहीं छोड़कर नारदमुनि वहाँसे चल पड़े और प्रत्येक तीर्थमें जा-जाकर मार्गमें मिलनेवाले मुनीश्‍वरोंसे वह साधन पूछने लगे॥ ३७॥

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