उनकी उस बातको सुनते तो सब थे, किंतु उसके विषयमें कोई कुछ भी निश्चित उत्तर न देता। किन्हींने उसे असाध्य बताया; कोई बोले—‘इसका ठीक-ठीक पता लगना ही कठिन है।’ कोई सुनकर चुप रह गये और कोई-कोई तो अपनी अवज्ञा होनेके भयसे बातको टाल-टूलकर खिसक गये॥ ३८॥
वृत्तान्तः श्रूयते सर्वैः किञ्चिन्निश्चित्य नोच्यते।
असाध्यं केचन प्रोचुर्दुर्ज्ञेयमिति चापरे।
मूकीभूतास्तथान्ये तु कियन्तस्तु पलायिताः॥ ३८
उनकी उस बातको सुनते तो सब थे, किंतु उसके विषयमें कोई कुछ भी निश्चित उत्तर न देता। किन्हींने उसे असाध्य बताया; कोई बोले—‘इसका ठीक-ठीक पता लगना ही कठिन है।’ कोई सुनकर चुप रह गये और कोई-कोई तो अपनी अवज्ञा होनेके भयसे बातको टाल-टूलकर खिसक गये॥ ३८॥
श्रीमद्भागवत महापुराण PRE.2.38 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 43) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/mahatmya/padma/2/38/