॥ श्रीहरिः ॥
अद्य नः सर्वभूतात्मन् कामकर्मेन्द्रियाशयः।
मोहपाशो दृढश्छिन्नो भगवंस्तव दर्शनात्॥ २७
adya naḥ sarvabhūtātman kāmakarmendriyāśayaḥ|
mohapāśo dṛḍhaśchinno bhagavaṃstava darśanāt|| 27
अर्थ
समस्त प्राणियोंके आत्मा प्रभो! आज आपके दर्शनसे मेरे मोहकी वह दृढ़ फाँसी कट गयी जो कामना, कर्म और इन्द्रियोंको जीवनदान देती है॥ २७॥
अद्य नः सर्वभूतात्मन् कामकर्मेन्द्रियाशयः।
मोहपाशो दृढश्छिन्नो भगवंस्तव दर्शनात्॥ २७
समस्त प्राणियोंके आत्मा प्रभो! आज आपके दर्शनसे मेरे मोहकी वह दृढ़ फाँसी कट गयी जो कामना, कर्म और इन्द्रियोंको जीवनदान देती है॥ २७॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 9.8.27 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 44) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/9/8/27/