श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 9.8.26

नवम स्कन्ध · अध्याय 8 · अथाष्टमोऽध्यायः

त्व५न्मायारचिते लोके वस्तुबुद्ध्या गृहादिषु।

भ्रमन्ति कामलोभेर्ष्यामोहविभ्रान्तचेतसः॥ २६

tvanmāyāracite loke vastubuddhyā gṛhādiṣu|

bhramanti kāmalobherṣyāmohavibhrāntacetasaḥ|| 26

अर्थ

प्रभो! यह संसार आपकी मायाकी करामात है। इसको सत्य समझकर काम, लोभ, ईर्ष्या और मोहसे लोगोंका चित्त शरीर तथा घर आदिमें भटकने लगता है। लोग इसीके चक्करमें फँस जाते हैं॥ २६॥

टिप्पणियाँ

  1. ५

    यत्त्वया रचि०।

    (मुद्रित पृष्ठ 44)

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