दाँतोंके फिर उग आनेपर वरुणने कहा—‘अब मेरा यज्ञ करो।’ हरिश्चन्द्रने कहा—‘वरुणजी महाराज! क्षत्रियपशु तब यज्ञके योग्य होता है जब वह कवच धारण करने लगे’॥ १४॥✎ 16372046
पुनर्जाता यजस्वेति स प्रत्याहाथ सोऽब्रवीत्।
सान्नाहिको यदा राजन् राजन्योऽथ पशुः शुचिः॥ १४
दाँतोंके फिर उग आनेपर वरुणने कहा—‘अब मेरा यज्ञ करो।’ हरिश्चन्द्रने कहा—‘वरुणजी महाराज! क्षत्रियपशु तब यज्ञके योग्य होता है जब वह कवच धारण करने लगे’॥ १४॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 9.7.14 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 39) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/9/7/14/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)