श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 9.4.47

नवम स्कन्ध · अध्याय 4 · अथ चतुर्थोऽध्यायः

तामापतन्तीं ज्वल४तीमसिहस्तां पदा भुवम्।

वेपयन्तीं समुद्वीक्ष्य न चचाल पदान्‍नृपः॥ ४७

tāmāpatantīṃ jvalatīmasihastāṃ padā bhuvam|

vepayantīṃ samudvīkṣya na cacāla padānnṛpaḥ|| 47

अर्थ

वह आगके समान जलती हुई, हाथमें तलवार लेकर राजा अम्बरीषपर टूट पड़ी। उस समय उसके पैरोंकी धमकसे पृथ्वी काँप रही थी। परन्तु राजा अम्बरीष उसे देखकर उससे तनिक भी विचलित नहीं हुए। वे एक पग भी नहीं हटे, ज्यों-के-त्यों खड़े रहे॥ ४७॥✎ 876

टिप्पणियाँ

  1. ४

    लन्तीमसि०।

    (मुद्रित पृष्ठ 24)
इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #876 शब्दोंके बीचका स्थान: समयउसके → समय उसके

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