वे अपने हृदयमें अनन्त प्रेमका दान करनेवाले श्रीहरिका नित्य-निरन्तर दर्शन करते रहते थे। इसलिये उन लोगोंको वह भोग-सामग्री भी हर्षित नहीं कर पाती थी, जो बड़े-बड़े सिद्धोंको भी दुर्लभ है। वे वस्तुएँ उनके आत्मानन्दके सामने अत्यन्त तुच्छ और तिरस्कृत थीं॥ २५॥
समर्द्धयन्ति तान् कामाः स्वाराज्यपरिभाविताः।
दुर्लभा नापि सिद्धानां मुकुन्दं हृदि पश्यतः॥ २५
वे अपने हृदयमें अनन्त प्रेमका दान करनेवाले श्रीहरिका नित्य-निरन्तर दर्शन करते रहते थे। इसलिये उन लोगोंको वह भोग-सामग्री भी हर्षित नहीं कर पाती थी, जो बड़े-बड़े सिद्धोंको भी दुर्लभ है। वे वस्तुएँ उनके आत्मानन्दके सामने अत्यन्त तुच्छ और तिरस्कृत थीं॥ २५॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 9.4.25 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 21) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/4/25/
टिप्पणियाँ
२
वेष्टिताः।
(मुद्रित पृष्ठ 21)
३
पश्यताम्।
(मुद्रित पृष्ठ 21)
इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
#1128 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): स्वाराज्यपरिभी → स्वाराज्यपरिभा