श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 9.2.33

नवम स्कन्ध · अध्याय 2 · अथ द्वितीयोऽध्यायः

विशालः शून्यबन्धुश्‍च धूम्रकेतुश्‍च तत्सुताः।

विशालो वंशकृद् राजा वैशालीं निर्ममे पुरीम्॥ ३३

viśālaḥ śūnyabandhuśca dhūmraketuśca tatsutāḥ|

viśālo vaṃśakṛd rājā vaiśālīṃ nirmame purīm|| 33

अर्थ

महाराज तृणबिन्दुके अपनी धर्मपत्‍नीसे तीन पुत्र हुए—विशाल, शून्यबन्धु और धूम्रकेतु। उनमेंसे राजा विशाल वंशधर हुए और उन्होंने वैशाली नामकी नगरी बसायी॥ ३३॥

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें