श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 9.16.19

नवम स्कन्ध · अध्याय 16 · अथ षोडशोऽध्यायः

त्रिःसप्तकृत्वः पृथिवीं कृत्वा निःक्षत्रियां प्रभुः।

समन्तपंचके चक्रे शोणितोदान् ह्रदान् नृप॥ १९✎ 1136

triḥsaptakṛtvaḥ pṛthivīṃ kṛtvā niḥkṣatriyāṃ prabhuḥ|

samantapaṃcake cakre śoṇitodān hradān nṛpa|| 19

अर्थ

उनके रक्तसे एक बड़ी भयंकर नदी बह निकली, जिसे देखकर ब्राह्मणद्रोहियोंका हृदय भयसे काँप उठता था। भगवान्‌ने देखा कि वर्तमान क्षत्रिय अत्याचारी हो गये हैं। इसलिये राजन्! उन्होंने अपने पिताके वधको निमित्त बनाकर इक्कीस बार पृथ्वीको क्षत्रियहीन कर दिया और कुरुक्षेत्रके समन्तपंचकमें ऐसे-ऐसे पाँच तालाब बना दिये, जो रक्तके जलसे भरे हुए थे॥ १८-१९॥

यह अर्थ श्लोक 18–19 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1136 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): हृदान् → ह्रदान्

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