श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 9.15.29

नवम स्कन्ध · अध्याय 15 · अथ पञ्चदशोऽध्यायः

तमापतन्तं भृगुवर्यमोजसा

धनुर्धरं बाणपरश्‍वधायुधम्।

ऐणेयचर्माम्बरमर्कधामभि-

र्युतं जटाभिर्ददृशे पुरीं विशन्॥ २९

tamāpatantaṃ bhṛguvaryamojasā

dhanurdharaṃ bāṇaparaśvadhāyudham|

aiṇeyacarmāmbaramarkadhāmabhi-

ryutaṃ jaṭābhirdadṛśe purīṃ viśan|| 29

अर्थ

सहस्रबाहु अर्जुन अभी अपने नगरमें प्रवेश कर ही रहा था कि उसने देखा परशुरामजी महाराज बड़े वेगसे उसीकी ओर झपटे आ रहे हैं। उनकी बड़ी विलक्षण झाँकी थी। वे हाथमें धनुष-बाण और फरसा लिये हुए थे, शरीरपर काला मृगचर्म धारण किये हुए थे और उनकी जटाएँ सूर्यकी किरणोंके समान चमक रही थीं॥ २९॥

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