श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 9.14.4

नवम स्कन्ध · अध्याय 14 · अथ चतुर्दशोऽध्यायः

सोऽयजद् राजसूयेन विजित्य भुवनत्रयम्।

पत्‍नीं बृहस्पतेर्दर्पात् तारां नामाहरद् बलात्॥ ४

so'yajad rājasūyena vijitya bhuvanatrayam|

patnīṃ bṛhaspaterdarpāt tārāṃ nāmāharad balāt|| 4

अर्थ

उन्होंने तीनों लोकोंपर विजय प्राप्त की और राजसूय यज्ञ किया। इससे उनका घमंड बढ़ गया और उन्होंने बलपूर्वक बृहस्पतिकी पत्‍नी ताराको हर लिया॥ ४॥

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें