श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 9.14.5

नवम स्कन्ध · अध्याय 14 · अथ चतुर्दशोऽध्यायः

यदा स देवगुरुणा याचितोऽभीक्ष्णशो मदात्।

नात्यजत् तत्कृते जज्ञे सुरदानवविग्रहः॥ ५

yadā sa devaguruṇā yācito'bhīkṣṇaśo madāt|

nātyajat tatkṛte jajñe suradānavavigrahaḥ|| 5

अर्थ

देवगुरु बृहस्पतिने अपनी पत्‍नीको लौटा देनेके लिये उनसे बार-बार याचना की, परन्तु वे इतने मतवाले हो गये थे कि उन्होंने किसी प्रकार उनकी पत्‍नीको नहीं लौटाया। ऐसी परिस्थितिमें उसके लिये देवता और दानवमें घोर संग्राम छिड़ गया॥ ५॥

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