॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 9.13.3
निमिश्चलमिदं विद्वान् सत्रमारभतात्मवान्।
ऋत्विग्भिरपरैस्तावन्नागमद् यावता गुरुः॥ ३
nimiścalamidaṃ vidvān satramārabhatātmavān|
ṛtvigbhiraparaistāvannāgamad yāvatā guruḥ|| 3
अर्थ
विचारवान् निमिने यह सोचकर कि जीवन तो क्षणभंगुर है, विलम्ब करना उचित न समझा और यज्ञ प्रारम्भ कर दिया। जबतक गुरु वसिष्ठजी न लौटें, तबतकके लिये उन्होंने दूसरे ऋत्विजोंको वरण कर लिया॥ ३॥