श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 9.13.3

नवम स्कन्ध · अध्याय 13 · अथ त्रयोदशोऽध्यायः

निमिश्‍चलमिदं विद्वान् सत्रमारभतात्मवान्।

ऋत्विग्भिरपरैस्तावन्‍नागमद् यावता गुरुः॥ ३

nimiścalamidaṃ vidvān satramārabhatātmavān|

ṛtvigbhiraparaistāvannāgamad yāvatā guruḥ|| 3

अर्थ

विचारवान् निमिने यह सोचकर कि जीवन तो क्षणभंगुर है, विलम्ब करना उचित न समझा और यज्ञ प्रारम्भ कर दिया। जबतक गुरु वसिष्ठजी न लौटें, तबतकके लिये उन्होंने दूसरे ऋत्विजोंको वरण कर लिया॥ ३॥

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