गुरु वसिष्ठजी जब इन्द्रका यज्ञ सम्पन्न करके लौटे तो उन्होंने देखा कि उनके शिष्य निमिने तो उनकी बात न मानकर यज्ञ प्रारम्भ कर दिया है। उस समय उन्होंने शाप दिया कि ‘निमिको अपनी विचारशीलता और पाण्डित्यका बड़ा घमंड है, इसलिये इसका शरीरपात हो जाय’॥ ४॥
शिष्यव्यतिक्रमं वीक्ष्य निर्वर्त्य गुरुरागतः।
अशपत् पतताद् देहो निमेः पण्डितमानिनः॥ ४
गुरु वसिष्ठजी जब इन्द्रका यज्ञ सम्पन्न करके लौटे तो उन्होंने देखा कि उनके शिष्य निमिने तो उनकी बात न मानकर यज्ञ प्रारम्भ कर दिया है। उस समय उन्होंने शाप दिया कि ‘निमिको अपनी विचारशीलता और पाण्डित्यका बड़ा घमंड है, इसलिये इसका शरीरपात हो जाय’॥ ४॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 9.13.4 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 67) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/13/4/