भरतजीने उनके चरणोंमें गिरकर उन्हें प्रसन्न किया और उनके आग्रह करनेपर भगवान् श्रीरामने राजसिंहासन स्वीकार किया। इसके बाद वे अपने-अपने धर्ममें तत्पर तथा वर्णाश्रमके आचारको निभानेवाली प्रजाका पिताके समान पालन करने लगे। उनकी प्रजा भी उन्हें अपना पिता ही मानती थी॥ ५१॥✎ 1639
अग्रहीदासनं भ्रात्रा प्रणिपत्य प्रसादितः।
प्रजाः स्वधर्मनिरता वर्णाश्रमगुणान्विताः।
जुगोप पितृवद् रामो मेनिरे पितरं च तम्॥ ५१
भरतजीने उनके चरणोंमें गिरकर उन्हें प्रसन्न किया और उनके आग्रह करनेपर भगवान् श्रीरामने राजसिंहासन स्वीकार किया। इसके बाद वे अपने-अपने धर्ममें तत्पर तथा वर्णाश्रमके आचारको निभानेवाली प्रजाका पिताके समान पालन करने लगे। उनकी प्रजा भी उन्हें अपना पिता ही मानती थी॥ ५१॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 9.10.51 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 59) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/9/10/51/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)