श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 9.10.49

नवम स्कन्ध · अध्याय 10 · अथ दशमोऽध्यायः

जटा निर्मुच्य विधिवत् कुलवृद्धैः समं गुरुः।

अभ्यषिंचद् यथैवेन्द्रं चतुः३सिन्धुजलादिभिः॥ ४९

jaṭā nirmucya vidhivat kulavṛddhaiḥ samaṃ guruḥ|

abhyaṣiṃcad yathaivendraṃ catuḥsindhujalādibhiḥ|| 49

अर्थ

इसके बाद वसिष्ठजीने दूसरे गुरुजनोंके साथ विधिपूर्वक भगवान्‌की जटा उतरवायी और बृहस्पतिने जैसे इन्द्रका अभिषेक किया था, वैसे ही चारों समुद्रोंके जल आदिसे उनका अभिषेक किया॥ ४९॥✎ 1639

टिप्पणियाँ

  1. ३

    चतुर्भिः सागराम्बुभिः।

    (मुद्रित पृष्ठ 59)
इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1639 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: विधि-पूर्वक → विधिपूर्वक

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