इसके बाद वसिष्ठजीने दूसरे गुरुजनोंके साथ विधिपूर्वक भगवान्की जटा उतरवायी और बृहस्पतिने जैसे इन्द्रका अभिषेक किया था, वैसे ही चारों समुद्रोंके जल आदिसे उनका अभिषेक किया॥ ४९॥✎ 1639
जटा निर्मुच्य विधिवत् कुलवृद्धैः समं गुरुः।
अभ्यषिंचद् यथैवेन्द्रं चतुःसिन्धुजलादिभिः॥ ४९
इसके बाद वसिष्ठजीने दूसरे गुरुजनोंके साथ विधिपूर्वक भगवान्की जटा उतरवायी और बृहस्पतिने जैसे इन्द्रका अभिषेक किया था, वैसे ही चारों समुद्रोंके जल आदिसे उनका अभिषेक किया॥ ४९॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 9.10.49 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 59) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/9/10/49/