श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 9.10.48

नवम स्कन्ध · अध्याय 10 · अथ दशमोऽध्यायः

पुत्रान् स्वमातरस्तास्तु प्राणांस्तन्व इवोत्थिताः।

आरोप्याङ्केऽभिषिंचन्त्यो बाष्पौघैर्विजहुः शुचः॥ ४८

putrān svamātarastāstu prāṇāṃstanva ivotthitāḥ|

āropyāṅke'bhiṣiṃcantyo bāṣpaughairvijahuḥ śucaḥ|| 48

अर्थ

उस समय जैसे मृतक शरीरमें प्राणोंका संचार हो जाय, वैसे ही माताएँ अपने पुत्रोंके आगमनसे हर्षित हो उठीं। उन्होंने उनको अपनी गोदमें बैठा लिया और अपने आँसुओंसे उनका अभिषेक किया। उस समय उनका सारा शोक मिट गया॥ ४८॥✎ 1639

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
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