॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 9.10.47
गुरून् वयस्यावरजान् पूजितः प्रत्यपूजयत्।
वैदेही लक्ष्मणश्चैव यथावत् समुपेयतुः॥ ४७
gurūn vayasyāvarajān pūjitaḥ pratyapūjayat|
vaidehī lakṣmaṇaścaiva yathāvat samupeyatuḥ|| 47
अर्थ
इस प्रकार भगवान्ने भाइयोंका अभिनन्दन स्वीकार करके उनके साथ अयोध्यापुरीमें प्रवेश किया। उस समय वह पुरी आनन्दोत्सवसे परिपूर्ण हो रही थी। राजमहलमें प्रवेश करके उन्होंने अपनी माता कौसल्या, अन्य माताओं, गुरुजनों, बराबरके मित्रों और छोटोंका यथायोग्य सम्मान किया तथा उनके द्वारा किया हुआ सम्मान स्वीकार किया। श्रीसीताजी और लक्ष्मणजीने भी भगवान्के साथ-साथ सबके प्रति यथायोग्य व्यवहार किया॥ ४६-४७॥✎ 1639