॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 9.10.12
दग्ध्वाऽऽत्मकृत्यहतकृत्यमहन् कबन्धं
सख्यं विधाय कपिभिर्दयितागतिं तैः।
बुद्ध्वाथ वालिनि हते प्लवगेन्द्रसैन्यै-
र्वेलामगात् स मनुजोऽजभवार्चिताङ्घ्रिः॥ १२
dagdhvā''tmakṛtyahatakṛtyamahan kabandhaṃ
sakhyaṃ vidhāya kapibhirdayitāgatiṃ taiḥ|
buddhvātha vālini hate plavagendrasainyai-
rvelāmagāt sa manujo'jabhavārcitāṅghriḥ|| 12
अर्थ
इसके बाद भगवान्ने उस जटायुका दाह-संस्कार किया, जिसके सारे कर्मबन्धन भगवत्सेवारूप कर्मसे पहले ही भस्म हो चुके थे। फिर भगवान्ने कबन्धका संहार किया और इसके अनन्तर सुग्रीव आदि वानरोंसे मित्रता करके वालिका वध किया, तदनन्तर वानरोंके द्वारा अपनी प्राणप्रियाका पता लगवाया। ब्रह्मा और शंकर जिनके चरणोंकी वन्दना करते हैं वे भगवान् श्रीराम मनुष्यकी-सी लीला करते हुए बंदरोंकी सेनाके साथ समुद्रतटपर पहुँचे॥ १२॥✎ 2048