॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 9.10.11
रक्षोऽधमेन वृकवद् विपिनेऽसमक्षं
वैदेहराजदुहितर्यपयापितायाम् ।
भ्रात्रा वने कृपणवत् प्रियया वियुक्तः
स्त्रीसंगिनां गतिमिति प्रथयंश्चचार॥ ११
rakṣo'dhamena vṛkavad vipine'samakṣaṃ
vaideharājaduhitaryapayāpitāyām |
bhrātrā vane kṛpaṇavat priyayā viyuktaḥ
strīsaṃgināṃ gatimiti prathayaṃścacāra|| 11
अर्थ
जब भगवान् श्रीराम जंगलमें दूर निकल गये, तब (लक्ष्मणकी अनुपस्थितिमें) नीच राक्षस रावणने भेड़ियेके समान विदेहनन्दिनी सुकुमारी श्रीसीताजीको हर लिया। तदनन्तर वे अपनी प्राणप्रिया सीताजीसे बिछुड़कर अपने भाई लक्ष्मणके साथ वन-वनमें दीनकी भाँति घूमने लगे। और इस प्रकार उन्होंने यह शिक्षा दी कि ‘जो स्त्रियोंमें आसक्ति रखते हैं, उनकी यही गति होती है’॥ ११॥✎ 2048