श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 9.10.13

नवम स्कन्ध · अध्याय 10 · अथ दशमोऽध्यायः

यद्रोषविभ्रम१विवृत्तकटाक्षपात-

संभ्रान्तनक्रमकरो भयगीर्णघोषः।

सिन्धुः शिरस्यर्हणं परिगृह्य रूपी

पादारविन्दमुपगम्य बभाष एतत्॥ १३

yadroṣavibhramavivṛttakaṭākṣapāta-

saṃbhrāntanakramakaro bhayagīrṇaghoṣaḥ|

sindhuḥ śirasyarhaṇaṃ parigṛhya rūpī

pādāravindamupagamya babhāṣa etat|| 13

अर्थ

(वहाँ उपवास और प्रार्थनासे जब समुद्रपर कोई प्रभाव न पड़ा, तब) भगवान्‌ने क्रोधकी लीला करते हुए अपनी उग्र एवं टेढ़ी नजर समुद्रपर डाली। उसी समय समुद्रके बड़े-बड़े मगर और मच्छ खलबला उठे। डर जानेके कारण समुद्रकी सारी गर्जना शान्त हो गयी। तब समुद्र शरीरधारी बनकर और अपने सिरपर बहुत-सी भेंटें लेकर भगवान्‌के चरणकमलोंकी शरणमें आया और इस प्रकार कहने लगा॥ १३॥✎ 2048

टिप्पणियाँ

  1. १

    मकटाक्षविटंकपात०।

    (मुद्रित पृष्ठ 54)
इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #2048 यूनिकोड-रूप (अक्षर वही): डि़ → ड़ि

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