बड़े-बड़े दैत्योंने मोहिनीकी यह मीठी बात सुनकर उसकी बारीकी नहीं समझी, इसलिये सबने एक स्वरसे कह दिया ‘स्वीकार है।’ इसका कारण यह था कि उन्हें मोहिनीके वास्तविक स्वरूपका पता नहीं था॥ १३॥
इत्यभिव्याहृतं तस्या आकर्ण्यासुरपुङ्गवाः।
अप्रमाणविदस्तस्यास्तत् तथेत्यन्वमंसत॥ १३
बड़े-बड़े दैत्योंने मोहिनीकी यह मीठी बात सुनकर उसकी बारीकी नहीं समझी, इसलिये सबने एक स्वरसे कह दिया ‘स्वीकार है।’ इसका कारण यह था कि उन्हें मोहिनीके वास्तविक स्वरूपका पता नहीं था॥ १३॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 8.9.13 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 948) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/8/9/13/