श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 8.9.12

अष्टम स्कन्ध · अध्याय 9 · अथ नवमोऽध्यायः

ततो गृहीत्वामृतभाजनं हरि-

र्बभाष ईषत्स्मितशोभया गिरा।

यद्यभ्युपेतं क्‍व च साध्वसाधु वा

कृतं मया वो विभजे सुधामिमाम्॥ १२

tato gṛhītvāmṛtabhājanaṃ hari-

rbabhāṣa īṣatsmitaśobhayā girā|

yadyabhyupetaṃ kva ca sādhvasādhu vā

kṛtaṃ mayā vo vibhaje sudhāmimām|| 12

अर्थ

भगवान्‌ने अमृतका कलश अपने हाथमें लेकर तनिक मुसकराते हुए मीठी वाणीसे कहा—‘मैं उचित या अनुचित जो कुछ भी करूँ, वह सब यदि तुमलोगोंको स्वीकार हो तो मैं यह अमृत बाँट सकती हूँ’॥ १२॥✎ 718

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #718 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् ने → भगवान्‌ने

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