श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 8.6.10

अष्टम स्कन्ध · अध्याय 6 · अथ षष्ठोऽध्यायः

त्वय्यग्र आसीत् त्वयि मध्य आसीत्

त्वय्यन्त आसीदिदमात्मतन्त्रे।

त्वमादिरन्तो जगतोऽस्य मध्यं

घटस्य मृत्स्नेव परः परस्मात्॥ १०

tvayyagra āsīt tvayi madhya āsīt

tvayyanta āsīdidamātmatantre|

tvamādiranto jagato'sya madhyaṃ

ghaṭasya mṛtsneva paraḥ parasmāt|| 10

अर्थ

आपमें ही पहले यह जगत् लीन था, मध्यमें भी यह आपमें ही स्थित है और अन्तमें भी यह पुनः आपमें ही लीन हो जायगा। आप स्वयं कार्य- कारणसे परे परम स्वतन्त्र हैं। आप ही इस जगत‍्के आदि, अन्त और मध्य हैं—वैसे ही जैसे घड़ेका आदि, मध्य और अन्त मिट्टी है॥ १०॥

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