श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 8.6.11

अष्टम स्कन्ध · अध्याय 6 · अथ षष्ठोऽध्यायः

त्वं माययाऽऽत्माश्रयया स्वयेदं

निर्माय विश्‍वं तदनुप्रविष्टः।

पश्यन्ति युक्ता मनसा मनीषिणो

गुणव्यवायेऽप्यगुणं विपश्चितः॥ ११

tvaṃ māyayā''tmāśrayayā svayedaṃ

nirmāya viśvaṃ tadanupraviṣṭaḥ|

paśyanti yuktā manasā manīṣiṇo

guṇavyavāye'pyaguṇaṃ vipaścitaḥ|| 11

अर्थ

आप अपने ही आश्रय रहनेवाली अपनी मायासे इस संसारकी रचना करते हैं और इसमें फिरसे प्रवेश करके अन्तर्यामीके रूपमें विराजमान होते हैं। इसीलिये विवेकी और शास्त्रज्ञ पुरुष बड़ी सावधानीसे अपने मनको एकाग्र करके इन गुणोंकी, विषयोंकी भीड़में भी आपके निर्गुण स्वरूपका ही साक्षात्कार करते हैं॥ ११॥

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