श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 8.5.12

अष्टम स्कन्ध · अध्याय 5 · अथ पञ्चमोऽध्यायः

यथामृतं सुरैः प्राप्तं किञ्चान्यदभवत् ततः।

एतद् भगवतः कर्म वदस्व परमाद्भुतम्॥ १२

yathāmṛtaṃ suraiḥ prāptaṃ kiñcānyadabhavat tataḥ|

etad bhagavataḥ karma vadasva paramādbhutam|| 12

अर्थ

देवताओंको उस समय अमृत कैसे मिला? और भी कौन-कौन-सी वस्तुएँ समुद्रसे निकलीं? भगवान्‌की यह लीला बड़ी ही अद्भुत है, आप कृपा करके अवश्य सुनाइये॥ १२॥✎ 680 681 682

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (3)
  • #680 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #681 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #682 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् ने → भगवान्‌ने

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें