श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 8.5.11

अष्टम स्कन्ध · अध्याय 5 · अथ पञ्चमोऽध्यायः

राजोवाच

यथा भगवता ब्रह्मन्मथितः क्षीरसागरः।

यदर्थं वा यतश्चाद्रिं दधाराम्बुचरात्मना॥ ११

yathā bhagavatā brahmanmathitaḥ kṣīrasāgaraḥ|

yadarthaṃ vā yataścādriṃ dadhārāmbucarātmanā|| 11

अर्थ

राजा परीक्षित‍्ने पूछा—भगवन्! भगवान्‌ने क्षीरसागरका मन्थन कैसे किया? उन्होंने कच्छपरूप धारण करके किस कारण और किस उद्देश्यसे मन्दराचलको अपनी पीठपर धारण किया?॥ ११॥✎ 680 681 682

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (3)
  • #680 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #681 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #682 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् ने → भगवान्‌ने

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