उन्होंने ही समुद्रमन्थन करके देवताओंको अमृत पिलाया था, तथा वे ही कच्छपरूप धारण करके मन्दराचलकी मथानीके आधार बने थे॥ १०॥✎ 679
पयोधिं येन निर्मथ्य सुराणां साधिता सुधा।
भ्रममाणोऽम्भसि धृतः कूर्मरूपेण मन्दरः॥ १०
उन्होंने ही समुद्रमन्थन करके देवताओंको अमृत पिलाया था, तथा वे ही कच्छपरूप धारण करके मन्दराचलकी मथानीके आधार बने थे॥ १०॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 8.5.10 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 923) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/8/5/10/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)