आप भक्तवत्सल भगवान्की महिमाका ज्यों-ज्यों वर्णन करते हैं, त्यों-ही-त्यों मेरा हृदय उसको और भी सुननेके लिये उत्सुक होता जा रहा है। अघानेका तो नाम ही नहीं लेता। क्यों न हो, बहुत दिनोंसे यह संसारकी ज्वालाओंसे जलता जो रहा है॥ १३॥✎ 680681682
त्वया सङ्कथ्यमानेन महिम्ना सात्वतां पतेः।
नातितृप्यति मे चित्तं सुचिरं तापतापितम्॥ १३
आप भक्तवत्सल भगवान्की महिमाका ज्यों-ज्यों वर्णन करते हैं, त्यों-ही-त्यों मेरा हृदय उसको और भी सुननेके लिये उत्सुक होता जा रहा है। अघानेका तो नाम ही नहीं लेता। क्यों न हो, बहुत दिनोंसे यह संसारकी ज्वालाओंसे जलता जो रहा है॥ १३॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 8.5.13 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 923) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/8/5/13/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (3)