श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 8.4.9

अष्टम स्कन्ध · अध्याय 4 · अथ चतुर्थोऽध्यायः

यदृच्छया तत्र महायशा मुनिः

समागमच्छिष्यगणैः परिश्रितः।

तं वीक्ष्य तूष्णीमकृतार्हणादिकं

रहस्युपासीनमृषिश्चुकोप ह॥ ९

yadṛcchayā tatra mahāyaśā muniḥ

samāgamacchiṣyagaṇaiḥ pariśritaḥ|

taṃ vīkṣya tūṣṇīmakṛtārhaṇādikaṃ

rahasyupāsīnamṛṣiścukopa ha|| 9

अर्थ

उसी समय दैवयोगसे परम यशस्वी अगस्त्य मुनि अपनी शिष्यमण्डलीके साथ वहाँ आ पहुँचे। उन्होंने देखा कि यह प्रजापालन और गृहस्थोचित अतिथिसेवा आदि धर्मका परित्याग करके तपस्वियोंकी तरह एकान्तमें चुपचाप बैठकर उपासना कर रहा है, इसलिये वे राजा इन्द्रद्युम्नपर क्रुद्ध हो गये॥ ९॥

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