॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 8.4.10
तस्मा इमं शापमदादसाधु-
रयं दुरात्माकृतबुद्धिरद्य।
विप्रावमन्ता विशतां तमोऽन्धं
यथा गजः स्तब्धमतिः स एव॥ १०
tasmā imaṃ śāpamadādasādhu-
rayaṃ durātmākṛtabuddhiradya|
viprāvamantā viśatāṃ tamo'ndhaṃ
yathā gajaḥ stabdhamatiḥ sa eva|| 10
अर्थ
उन्होंने राजाको यह शाप दिया—‘इस राजाने गुरुजनोंसे शिक्षा नहीं ग्रहण की है, अभिमानवश परोपकारसे निवृत्त होकर मनमानी कर रहा है। ब्राह्मणोंका अपमान करनेवाला यह हाथीके समान जडबुद्धि है, इसलिये इसे वही घोर अज्ञानमयी हाथीकी योनि प्राप्त हो’॥ १०॥