श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 8.4.11

अष्टम स्कन्ध · अध्याय 4 · अथ चतुर्थोऽध्यायः

श्रीशुक उवाच

एवं शप्त्वा गतोऽगस्त्यो भगवान् नृप सानुगः।

इन्द्रद्युम्नोऽपि राजर्षिर्दिष्टं तदुपधारयन्॥ ११

evaṃ śaptvā gato'gastyo bhagavān nṛpa sānugaḥ|

indradyumno'pi rājarṣirdiṣṭaṃ tadupadhārayan|| 11

अर्थ

श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! शाप एवं वरदान देनेमें समर्थ अगस्त्य ऋषि इस प्रकार शाप देकर अपनी शिष्यमण्डलीके साथ वहाँसे चले गये। राजर्षि इन्द्रद्युम्नने यह समझकर सन्तोष किया कि यह मेरा प्रारब्ध ही था॥ ११॥✎ 672 673

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #672 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #673 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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