एक बार राजा इन्द्रद्युम्न राजपाट छोड़कर मलयपर्वतपर रहने लगे थे। उन्होंने जटाएँ बढ़ा लीं, तपस्वीका वेष धारण कर लिया। एक दिन स्नानके बाद पूजाके समय मनको एकाग्र करके एवं मौनव्रती होकर वे सर्वशक्तिमान् भगवान्की आराधना कर रहे थे॥ ८॥✎ 671
स एकदाऽऽराधनकाल आत्मवान्
गृहीतमौनव्रत ईश्वरं हरिम्।
जटाधरस्तापस आप्लुतोऽच्युतं
समर्चयामास कुलाचलाश्रमः॥ ८
एक बार राजा इन्द्रद्युम्न राजपाट छोड़कर मलयपर्वतपर रहने लगे थे। उन्होंने जटाएँ बढ़ा लीं, तपस्वीका वेष धारण कर लिया। एक दिन स्नानके बाद पूजाके समय मनको एकाग्र करके एवं मौनव्रती होकर वे सर्वशक्तिमान् भगवान्की आराधना कर रहे थे॥ ८॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 8.4.8 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 920) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/8/4/8/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)