श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 8.18.16

अष्टम स्कन्ध · अध्याय 18 · अथाष्टादशोऽध्यायः

कमण्डलुं वेदगर्भः कुशान्सप्तर्षयो ददुः।

अक्षमालां महाराज सरस्वत्यव्ययात्मनः॥ १६

kamaṇḍaluṃ vedagarbhaḥ kuśānsaptarṣayo daduḥ|

akṣamālāṃ mahārāja sarasvatyavyayātmanaḥ|| 16

अर्थ

परीक्षित्! अविनाशी प्रभुको ब्रह्माजीने कमण्डलु, सप्तर्षियोंने कुश और सरस्वतीने रुद्राक्षकी माला समर्पित की॥ १६॥✎ 782 783 1626

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (3)
  • #782 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् को → भगवान्‌को
  • #783 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् को → भगवान्‌को
  • #1626 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: वामन-भगवान्‌का → वामनभगवान्‌का

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