श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 8.18.15

अष्टम स्कन्ध · अध्याय 18 · अथाष्टादशोऽध्यायः

ददौ कृष्णाजिनं भूमिर्दण्डं सोमो वनस्पतिः।

कौपीनाच्छादनं माता द्यौश्छत्रं जगतः पतेः॥ १५

dadau kṛṣṇājinaṃ bhūmirdaṇḍaṃ somo vanaspatiḥ|

kaupīnācchādanaṃ mātā dyauśchatraṃ jagataḥ pateḥ|| 15

अर्थ

पृथ्वीने कृष्णमृगका चर्म, वनके स्वामी चन्द्रमाने दण्ड, माता अदितिने कौपीन और कटिवस्त्र एवं आकाशके अभिमानी देवताने वामनवेषधारी भगवान्‌को छत्र दिया॥ १५॥✎ 782 783 1626

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (3)
  • #782 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् को → भगवान्‌को
  • #783 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् को → भगवान्‌को
  • #1626 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: वामन-भगवान्‌का → वामनभगवान्‌का

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