श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 8.18.10

अष्टम स्कन्ध · अध्याय 18 · अथाष्टादशोऽध्यायः

गायन्तोऽतिप्रशंसन्तो नृत्यन्तो विबुधानुगाः।

आदित्या आश्रमपदं कुसुमैः समवाकिरन्॥ १०

gāyanto'tipraśaṃsanto nṛtyanto vibudhānugāḥ|

ādityā āśramapadaṃ kusumaiḥ samavākiran|| 10

अर्थ

सिद्ध, विद्याधर, किम्पुरुष, किन्‍नर, चारण, यक्ष, राक्षस, पक्षी, मुख्य-मुख्य नागगण और देवताओंके अनुचर नाचने-गाने एवं भूरि-भूरि प्रशंसा करने लगे तथा उन लोगोंने अदितिके आश्रमको पुष्पोंकी वर्षासे ढक दिया॥ ९-१०॥

यह अर्थ श्लोक 9–10 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

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