श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 8.18.11

अष्टम स्कन्ध · अध्याय 18 · अथाष्टादशोऽध्यायः

दृष्ट्वादितिस्तं निजगर्भसम्भवं

परं पुमांसं मुदमाप विस्मिता।

गृहीतदेहं निजयोगमायया

प्रजापतिश्चाह जयेति विस्मितः॥ ११

dṛṣṭvāditistaṃ nijagarbhasambhavaṃ

paraṃ pumāṃsaṃ mudamāpa vismitā|

gṛhītadehaṃ nijayogamāyayā

prajāpatiścāha jayeti vismitaḥ|| 11

अर्थ

जब अदितिने अपने गर्भसे प्रकट हुए परम पुरुष परमात्माको देखा, तो वह अत्यन्त आश्‍चर्यचकित और परमानन्दित हो गयी। प्रजापति कश्यपजी भी भगवान्‌को अपनी योगमायासे शरीर धारण किये हुए देख विस्मित हो गये और कहने लगे ‘जय हो! जय हो’॥ ११॥✎ 780 1625

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #780 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् को → भगवान्‌को
  • #1625 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: आश्‍चर्य-चकित → आश्‍चर्यचकित

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