श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 8.12.36

अष्टम स्कन्ध · अध्याय 12 · अथ द्वादशोऽध्यायः

अथावगतमाहात्म्य आत्मनो जगदात्मनः।

अपरिज्ञेयवीर्यस्य न मेने तदु हाद्भुतम्॥ ३६

athāvagatamāhātmya ātmano jagadātmanaḥ|

aparijñeyavīryasya na mene tadu hādbhutam|| 36

अर्थ

इसके बाद आत्मस्वरूप सर्वात्मा भगवान्‌की यह महिमा जानकर उन्हें कोई आश्‍चर्य नहीं हुआ। वे जानते थे कि भला, भगवान्‌की शक्तियोंका पार कौन पा सकता है॥ ३६॥✎ 734 735 736 737 738

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (5)
  • #734 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् ने → भगवान्‌ने
  • #735 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #736 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #737 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #738 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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