श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 8.12.35

अष्टम स्कन्ध · अध्याय 12 · अथ द्वादशोऽध्यायः

स्कन्‍ने रेतसि सोऽपश्यदात्मानं देवमायया।

जडीकृतं१ नृपश्रेष्ठ संन्यवर्तत कश्मलात्॥ ३५

skanne retasi so'paśyadātmānaṃ devamāyayā|

jaḍīkṛtaṃ nṛpaśreṣṭha saṃnyavartata kaśmalāt|| 35

अर्थ

परीक्षित्! वीर्यपात हो जानेके बाद उन्हें अपनी स्मृति हुई। उन्होंने देखा कि अरे, भगवान्‌की मायाने तो मुझे खूब छकाया! वे तुरंत उस दुःखद प्रसंगसे अलग हो गये॥ ३५॥✎ 734 735 736 737 738

टिप्पणियाँ

  1. १

    प्रा० पा०—जडीकृतो।

    (मुद्रित पृष्ठ 967)
इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (5)
  • #734 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् ने → भगवान्‌ने
  • #735 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #736 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #737 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #738 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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