नासमझ! तूने मायाकी बड़ी-बड़ी चालें चली है। देख, आज मैं अपने सौ धारवाले वज्रसे तेरा सिर धड़से अलग किये देता हूँ। तू अपने भाई-बन्धुओंके साथ जो कुछ कर सकता हो, करके देख ले’॥ ६॥
सोऽहं दुर्मायिनस्तेऽद्य वज्रेण शतपर्वणा।
शिरो हरिष्ये मन्दात्मन्घटस्व ज्ञातिभिः सह॥ ६
नासमझ! तूने मायाकी बड़ी-बड़ी चालें चली है। देख, आज मैं अपने सौ धारवाले वज्रसे तेरा सिर धड़से अलग किये देता हूँ। तू अपने भाई-बन्धुओंके साथ जो कुछ कर सकता हो, करके देख ले’॥ ६॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 8.11.6 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 958) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/8/11/6/