श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 8.11.5

अष्टम स्कन्ध · अध्याय 11 · अथैकादशोऽध्यायः

आरुरुक्षन्ति मायाभिरुत्सिसृप्सन्ति ये दिवम्।

तान्दस्यून्विधुनोम्यज्ञान्पूर्वस्माच्च पदादधः॥ ५

ārurukṣanti māyābhirutsisṛpsanti ye divam|

tāndasyūnvidhunomyajñānpūrvasmācca padādadhaḥ|| 5

अर्थ

जो मूर्ख मायाके द्वारा स्वर्गपर अधिकार करना चाहते हैं और उसको लाँघकर ऊपरके लोकोंमें भी धाक जमाना चाहते हैं—उन लुटेरे मूर्खोंको मैं उनके पहले स्थानसे भी नीचे पटक देता हूँ॥ ५॥

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